मुझे बहुत याद आ रही है जर्मनी की गीता

गली संस्कृति को बचाने के लिए वह विदेश से आकर लड़ी और हम हथौड़ा लेकर तोड़ रहे थे

वाराणसी से सुरेश प्रताप

जर्मनी की सुश्री गीता गंगाघाटी की पक्काप्पा संस्कृति के रहस्य को जानती थी. जर्मनी की सुविधाओं से सम्पन्न जिंदगी को दस साल पहले वह छोड़कर वह पक्काप्पा की गलियों में रहने के लिए आ गई थी. वह शिवशक्ति की उपासक थी. गली संस्कृति को बचाने के लिए वह विदेश से आकर लड़ी और हम हथौड़ा लेकर तोड़ रहे थे.

साल 2018 में जब पक्काप्पा में विध्वंस की लीला चल रही थी, तभी उससे हमारी मुलाकात हुई थी. उसके बाद तो अनेकों मुलाकातें हुई थीं. वह लगातार मुझे पक्काप्पा संस्कृति के बारे में लिखने को प्रेरित करती रही. हमने जो कुछ लिखा, वह उसकी प्रेरणा से ही लिखे. वह हमारे सभी लेखों का संकलन करके उसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने की योजना बना रही थी.

उसका कहना था कि तुम्हारी पांडुलिपि की हिंदी से अंग्रेजी और फिर जर्मन भाषा में हम बर्लिन से उसे प्रकाशित कराएंगे. वह हमेशा “उड़ता बनारस” के परिप्रेक्ष्य में हम जो कुछ लिख रहे थे, उसे जानने की कोशिश कर रही थी. पक्काप्पा के मंदिरों के बारे में उसे काफी जानकारी थी. उनके बारे में उसने मुझे बहुत कुछ बताया था.

जब भी हम मुक्तिधाम में जाते थे तो वह अक्सर वहां टहलते हुए मिल जाती थी. घंटों वह मेरे साथ रहती थी. ललिता घाट पर बने पत्थर के बुर्ज पर बैठना उसे पसंद था वहां से वह मणिकर्णिका घाट के श्मशान में जलती चित्ता को निहारती रहती थी. वह व्यक्ति के अंदर छिपी ऊर्जा के रहस्य को जानने की कोशिश कर रही थी.

पक्काप्पा संस्कृति की रक्षा के लिए जब आंदोलन शुरू हुआ तो वह अगली कतार में खड़ी थी. तब बनारस का प्रबुद्ध वर्ग खामोश था और जो कभी “धरोहर बचाओ आंदोलन” कर रहे थे, वे “योद्धा” सत्ता की हनक के सामने आत्मसमर्पण कर चुके थे. वातावरण में सन्नाटा व भय पसरा था.

उसने “धरोहर बचाओ” की लड़ाई को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी उठाया था. संयुक्त राष्ट्र को उसने कई पत्र लिखकर यूनेस्को से हस्तक्षेप करने की मांग की थी. तब पक्काप्पा संस्कृति के लोग उसे विक्षिप्त कह करके उसकी उपेक्षा कर रहे थे. और जिनका मस्तिष्क ठीक था वे प्रशासन व सत्ता के सामने आत्मसमर्पण करके घर बेचवाने की दलाली के धंधे से जुड़ गए. फिर बिके हुए घरों को जमींदोज करने और उसका मलबा हटाने की ठेकेदारी करने लगे. यह उनका अपना “विकास” था और वे आत्मनिर्भर बन गए.

30 दिसम्बर, 2019 को बीमारी के कारण बनारस में उसका निधन हो गया. मुझे अफसोस है कि जिस काम के लिए वह मुझे लगातार प्रेरित करती रही, उसे हम उसके जीवनकाल में पूरा नहीं कर सके. हम उसके सपने को साकार करने की कोशिश कर रहे हैं. मुझे पूरा भरोसा है कि इस उद्देश्य में हम सफल होंगे. हमारा काम अपने कर्तव्य को करना है, उसका परिणाम क्या होगा ? कोई नहीं जानता है.

हम उसके सपने को, जो पक्काप्पा की गलियों में टूटकर बिखर चुका है को सहेजने की कोशिश कर रहे हैं. मुझे लगता है कि यही उसके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी. उसकी आत्मा आज भी पक्काप्पा के खंडहरों में भटक रही है, जो अब धीरे-धीरे मुक्तिधाम बन रहा है. वह अक्सर पंडित केदारनाथ व्यास से मिलती रहती थी. अब तो व्यास जी भी नहीं रहे लेकिन उनकी आत्मा अब भी है. जब भी हम ललिताघाट की तरफ कोरोनाकाल के इस दौर में जाते हैं तो मुझे महसूस होता है कि उसकी आत्मा हमारे आसपास ही टहल रही है. वह अधूरे काम को अब भी सहेजने का संदेश देती है. मुझे लगता है कि जब तक एक भी व्यक्ति आवाज उठा रहा है, यह लड़ाई जारी रहेगी.

चित्र परिचय – काशी के पक्काप्पा संस्कृति की जिस गुफ़ा में गीता बैठकर साधना कर रही है, वह गणेश मंदिर है. यह मंदिर मणिकर्णिका घाट पर स्थित भिखारीमहल की कंदरा में रहा. भिखारी महल को लॉकडाउन के दौरान ही जमींदोज किया जा चुका है. यह तस्वीर एक साल पहले की है. शिवपुत्र विनायक का यह मंदिर अब किस स्थिति में है ? हम नहीं जानते. कभी इस मंदिर के बारे में मुझे गीता ने ही बताया था. वह कई बार मुझे वहां लेकर गई थी. वह अक्सर साधना करने वहां जाती थी. कभी भिखारीमहल के बरामदे से इस गुफ़ा में जाने का रास्ता था. मंदिर बरामदे से भी 10-15 फुट नीचे बनी गुफ़ा में था. वहां सीढ़ी बनी थी, जिसके सहारे लोग आते-जाते थे. बरामदे में कुछ लोग गाय रखे थे, जिससे चारों तरफ वहां अक्सर गोबर बिखरा रहता था. इस महल में भिखारी रहते थे और इसी कारण लोग इसे भिखारीमहल कहने लगे थे. लेकिन अब सब कुछ खत्म हो गया है और वहां महल का मलबा बिखरा पड़ा है. जिससे जेसीबी व ट्रैक्टर गंगाघाट तक धड़ल्ले से आते-जाते हैं. यह मुक्तिधाम का विकास है.

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